+++ पुत्रः कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि माता कुमाता न भवति +++

सुभाषितानि/नीति श्लोक में ऐसा कहा गया है कि यह संभव है कि पुत्र कुपुत्र हो सकता है किन्तु माता कुमाता कभी नहीं हो सकती. माँ के अंदर वात्सल्य और अपने पुत्री/पुत्र के प्रति नैसर्गिक प्रेम सदैव विद्यमान रहता है. माँ भगवती के विषय में हम क्या ही कह सकते है जिनके समक्ष सभी देवगण भी सदैव नतमस्तक रहते है.
यह तो निश्चय है की हमारा एक भी कर्म ऐसा नहीं है कि हम उस माँ सिद्धिदात्री के बच्चे कहला सके किन्तु वह हमारे अवगुणो पर ध्यान न देकर निरंतर अपने बच्चो का ख्याल रखती है, पुचकारती है और हम मालिनो को अपनी गोद में बैठालती है.
ऐसी ही एक अकल्पनीय अकथनीय कृपा के आज हम सभी साक्षी बने. माँ ने स्वयं अपनी भक्ति और प्रेम से ओतप्रोत एक संत को हमारे मंदिर में भेजा और उन्होंने श्री चंडीपाठ (सम्पूर्ण श्री दुर्गाशप्तशती ) एवं यज्ञ माँ के समक्ष अर्पित करा. यज्ञ के आरम्भ से अंत तक लगभग 5 घंटो के आनंद को शब्दों में समेट पाना किसी के लिए संभव नहीं है.
ऐसा विधि विधान पूर्वक यज्ञ का आयोजन करवाना हम सबकी सामर्थ्य और सोच से भी परे था, पर माँ महागौरी ने स्वामीजी रुपी अपने भक्त को भेजकर उसको पूर्ण करवाया. हे माँ हम सभी पर सदैव अपनी ऐसी ही प्रेम भरी दृष्टि बनाए रखियेगा।
जगद्गुरु श्री शंकराचार्य जी ने शायद हम जैसे अधम मनुष्यो के लिए ही कहा है कि :
न जानामि पुण्यं, न जानामि तीर्थं,
न जानामि मुक्तिं लयं वा कदाचित्।
न जानामि भक्तिं व्रतं नापि मातः,
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानी॥

मंदिर परिवार