संत श्री ज्ञानेश्वर महाराज जी और संत श्री तुकाराम महाराज जी
आग लगी आकाश में, झर-झर गिरे अंगार।
संत न होते जगत में, तो जल जाता संसार।।
मनुष्य को सन्मार्ग पर चलाने के लिए समय-समय पर भारतभूमि में अनेक संतों ने अवतार लिया है। इन संत महापुरुषों ने अपने ज्ञान, भक्ति और आदर्श जीवन से समाज को दिशा प्रदान की, असंख्य लोगों के जीवन को शीतलता दी तथा उन्हें ईश्वर के मार्ग की ओर अग्रसर किया।
महाराष्ट्र की पुण्यभूमि भी अनेक महान संतों की जन्मस्थली रही है। इन्हीं में दो प्रमुख नाम हैं—संत श्री ज्ञानेश्वर महाराज जी और संत श्री तुकाराम महाराज जी। आइए, संक्षेप में इनके जीवन और योगदान को जानते हैं।
संत श्री ज्ञानेश्वर महाराज जी
- संत श्री ज्ञानेश्वर महाराज का जन्म 13वीं शताब्दी में महाराष्ट्र के छत्रपती संभाजीनगर जिले में पैठण के पास गोदावरी नदी के किनारे आपेगाँव में हुआ। उनके पिता का नाम श्री विट्ठलपंत तथा माता का नाम श्रीमती रुक्मिणीबाई था।
- उनके तीन भाई-बहन थे—निवृत्तिनाथ, सोपानदेव तथा मुक्ताबाई। चारों ही उच्चकोटि के संत और आध्यात्मिक विभूतियाँ थे।
- माता-पिता के देहावसान के पश्चात् बाल्यावस्था में ही इन चारों भाई-बहनों को समाज के अत्यंत कठोर तिरस्कार और अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।
- विपरीत परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने कभी धर्म मार्ग नहीं छोड़ा।
- संत ज्ञानेश्वर महाराज ने महाराष्ट्र में ज्ञान और भक्ति का प्रकाश फैलाया तथा असंख्य लोगों को धर्म के पथ पर चलने की प्रेरणा दी।
- उन्होंने मात्र 15–16 वर्ष की अल्पायु में ‘ज्ञानेश्वरी की रचना की, जिसमें श्रीमद्भगवद्गीता का अत्यंत सरल और सहज मराठी भाषा में भावार्थ लिखा।
- मराठी समाज में ज्ञानेश्वरी का वही स्थान है, जो उत्तर भारत में गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित श्रीरामचरितमानस का है। दोनों ही ग्रंथों ने संस्कृत के दिव्य ज्ञान को लोकभाषा के माध्यम से सामान्य जन तक पहुँचाया।
- संत ज्ञानेश्वर महाराज ने आलंदी से पंढरपुर स्थित भगवान श्री विट्ठल के मंदिर तक पदयात्रा की। कालांतर में यही परंपरा पंढरपुर वारी के नाम से प्रसिद्ध हुई, जो आज भी लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है।
- मात्र 21 वर्ष की आयु में उन्होंने आलंदी में संजीवन समाधि ग्रहण की। आज यह स्थान उनके भक्तों के लिए एक तीर्थस्थल है।
संत श्री तुकाराम महाराज जी
- संत श्री तुकाराम महाराज का जन्म 16 वीं शताब्दी में महाराष्ट्र के देहु ग्राम में हुआ। उनके पिता का नाम बोल्होबा आंबिले तथा माता का नाम कनकाई आंबिले था।
- उनके जीवन में अनेक कठिनाइयाँ आईं। उन्होंने गरीबी, अकाल, व्यापार में हानि तथा माता-पिता, पत्नी और पुत्र के वियोग जैसे असहनीय दुःखों का सामना किया।
- इन सभी विपत्तियों के बीच भी उनकी भगवान श्री विट्ठल के प्रति अटूट श्रद्धा और भक्ति कभी विचलित नहीं हुई।
- उन्होंने भक्ति-रस से ओतप्रोत हजारों अभंगों की रचना की। उनके अभंग आज भी महाराष्ट्र की वारकरी परंपरा में अत्यंत श्रद्धा और प्रेम से गाए जाते हैं।
- संत तुकाराम महाराज ने जाति, वर्ण और सामाजिक भेदभाव से ऊपर उठकर सभी लोगों तक भक्ति का संदेश पहुँचाया तथा प्रेम, समानता, सेवा और नाम-स्मरण का मार्ग दिखाया।
- ऐसा कहा जाता है कि संत श्री तुकाराम जी, छत्रपति शिवजी महाराज के समकालीन थे और उन्होंने संत श्री तुकाराम जी दर्शन कर आशीर्वाद भी प्राप्त करा था.
- उनके जीवन और वाणी ने वारकरी संप्रदाय को नई ऊर्जा प्रदान की तथा लाखों लोगों को भगवान श्री विट्ठल की भक्ति से जोड़ा।
आज भी इन दोनों महान संतों की वाणी और जीवन-दर्शन श्रद्धालुओं को धर्म, भक्ति और परमार्थ के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दे रहे हैं। आगे हम इन दोनों संतो द्वारा शुरू की गई और खुद को गौरवान्वित करने वाली पंढरपुर वारि के विषय में जानेंगे।
आपका मंदिर परिवार
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