आग लगी आकाश में झर झर झरे अंगार,
संत न होते जगत में तो जल मरता संसार।।

हम सभी बहुत भाग्यशाली है कि हमारी जड़े पवित्र और समृद्ध भारतभूमि में है. जहाँ पर हर क्षेत्र में समय समय पर अनेको संतो ने जन्म लिए और भूले भटके मनुष्यो को पुनः सत मार्ग पर लगाया.
ऐसे ही एक प्रसिद्ध भक्त महाराष्ट्र के पंढरपुर में हुए जिनके लिए माता पिता की सेवा सर्वोपरि थी. एक बार जब एक रात्रि को वह अपने माता पिता की सेवा कर रहे थे तो भगवान श्री विष्णु उनके पास आये और उनको पुकारा, भक्त पुंडरिक अपने माता पिता की सेवा में इतने तल्लीन थे कि श्रीहरि को बोले की मैं अभी व्यस्त हूँ. श्रीहरि बोले की मैं तुम्हारी प्रतीक्षा करूँगा परन्तु मैं कहाँ बैठूँ। भक्त पुंडरिक ने बिना उनकी तरफ देखे एक ईट उनकी तरफ सरका दी और बोले की इसपर इंतज़ार कर लो. भगवान उनकी सेवा से ऐसे रीझे की आज भी वह उस ईट पर पुंडरिक के लिए खड़े है. अपने भक्त के इंतज़ार में विट (ईट) पर खड़े रहने के कारण उनका विट्ठल पड़ा और पंढरपुर में आज भी उन विट्ठल के दर्शन करे जा सकते है.
महान संत श्री ज्ञानेश्वर महाराज जी, श्री नामदेव जी और श्री एकनाथ जी ने भगवान विट्ठल की भक्ति को विस्तार दिया। आज से लगभग 500 वर्ष पूर्व संत श्री तुकाराम जी ने तो श्री विट्ठल जी के लिए अनेको अभंगो की रचना करी जो आज भी बड़े प्रेम और भाव से पूरे महाराष्ट्र में गाए जाते है.
संतो ने आषाढ़ माह में संत ज्ञानेश्वर जी के स्थान आळंदी से पंढरपुर तक एक पदयात्रा प्रारम्भ करी जिसको वारी भी कहा जाता है. सभी भक्त लगभग 250 km की पदयात्रा करके श्री विट्ठल जी के दर्शनों को जाते है, रास्ते भर अभंगो का गायन होता है. यह यात्रा रास्ते में पड़ने वाले विभिन्न स्थानों पर रूकती है और सभी लोग तन मन धन से सबका स्वागत और सत्कार करते है. आषाढ़ी एकादशी से एक दिन 05.07.2025 पहले यह पदयात्रा (वारी) पंढरपुर पहुँचती है और गुरु पूर्णिमा तक वहाँ रहती है.
इसी पदयात्रा (वारी) से प्रेरित होकर हम लोग भी 19.06.2025 को यह पदयात्रा शुरू करेंगे जो रोज़ एक भक्त के घर पर रुकेगी और 06.07.2025 को हमारे गीबल मंदिर पहुंचेगी. यदि आप भी चाहते है कि हमारे भक्तवत्सल श्री विट्ठल जी की वारी आपके घर आए तो हमसे संपर्क करे.
आइए हम सब मिलकर पंढरपुर वारी के भक्ति भाव से यहाँ के हर भक्त को सराबोर कर दे और एक साथ मिलकर बोले
पंढरीच्या वारीला, जगाचा आधार।
तुका म्हणे विठ्ठलबिना, नाही दुजा पार॥

(पंढरपुर की यात्रा ही संसार का आधार है। संत श्री तुकाराम जी कहते हैं, विट्ठल के बिना कोई मुक्ति नहीं।)
आपका मंदिर परिवार